ये तो ब्राह्मण नहीं || आचार्य प्रशांत, वज्रसूची उपनिषद् पर (2020)

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वीडियो जानकारी: अद्वैत बोध शिविर, 26.04.2020, ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश, भारत

प्रसंग:
उपनिषदकार कहते हैं कि जो समस्त दोषों से रहित, अद्वितीय, आत्मतत्व से संपृक्त है, वह ब्राह्मण है ! चूँकि आत्मतत्व सत्, चित्त, आनंद रूप ब्रह्म भाव से युक्त होता है, इसलिए इस ब्रह्म भाव से संपन्न मनुष्य को ही (सच्चा) ब्राह्मण कहा जा सकता है!
इन वर्णों में ब्राह्मण ही प्रधान है, ऐसा वेद वचन है और स्मृति में भी वर्णित है !
अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ब्राह्मण कौन है ? क्या वह जीव है अथवा कोई शरीर है अथवा जाति अथवा कर्म अथवा ज्ञान अथवा धार्मिकता है ?
इस स्थिति में यदि सर्वप्रथम जीव को ही ब्राह्मण मानें ( कि ब्राह्मण जीव है), तो यह संभव नहीं है; क्योंकि भूतकाल और भविष्यतकाल में अनेक जीव हुए होंगें ! उन सबका स्वरुप भी एक जैसा ही होता है ! जीव एक होने पर भी स्व-स्व कर्मों के अनुसार उनका जन्म होता है और समस्त शरीरों में, जीवों में एकत्व रहता है, इसलिए केवल जीव को ब्राह्मण नहीं कह सकते !
क्या शरीर ब्राह्मण (हो सकता) है?
नहीं, यह भी नहीं हो सकता ! चांडाल से लेकर सभी मानवों के शरीर एक जैसे ही अर्थात पांचभौतिक होते हैं,उनमें जरा-मरण, धर्म-अधर्म आदि सभी सामान होते हैं ! .........


~ असली ब्राह्मण कौन?
~ क्या जन्म से कोई ब्राह्मण होता है?
~ असली ब्राह्मण कैसे पहचाने?
~ ब्राह्मण कैसे हों?
~ क्या बहुत पाप करने के बाद भी ब्राह्मण हुआ जा सकता है?
~ क्या ब्राह्मण होने का अर्थ अविवाहित होना है?
~ विवाह, स्त्री और ब्राह्मण में क्या बातें सामान हैं?

संगीत: मिलिंद दाते
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